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  • Prakshi al-Shaeirah

मनोधड़






हमारी या यूँ  कह  लिया  जाये  कि हमारे  मन की एक  प्रवृत्ति रही है , स्वयं को अपूर्ण मानने की।  मन की यह अपूर्ण अवस्था ही हमारी अनगिनत आकांक्षाओं का कारण बन बैठी है। अपनी  अपर्याप्त स्थिति को पर्याप्त में  बदलने के   लिए मानस  बहुत से उपाए खोजता है। जीवन वास्तव में  उभयात्मक  है। प्रायः जब मन इसके  नकारात्मक  अँधेरे में  अपने मन रुपी धड़  के अंगो को तलाशता है , उस स्थिति में  असंतुष्टता उसकी परिसीमा तक जा पहुंचती  है। तम के उन अंगो से बना ,मनो - धड़ पर टिका  वह शरीर आत्मारहित अर्थात  व्यर्थ हो जाता है।    मानवीय अंतःकरण में इस घटना का घटन खूब होता है। अन्तःकरण के इसी प्रसंग की  व्याख्या  इस  कविता में मिलती है।  



मनोधड़ 

मनोधड़  को  

अनीति के पैर मत देना 

बड़ी तेज़ी से भाग जायेगा 

क्रोध का  हाथ 

यदि सामने दे जाये कोई 

मत लगाना इन्हे बाज़ुओं पर 

उंगलिया अंगारे लेना जानती हैं 

भस्मप्रज्ञा का वरदान मिल जायेगा 

मस्तक के दो भय नयन है 

गर्दन पर मत सजोना इसे 

तम के जग में भटक जाओगे 

धड़-जोड़ का काम लिए 

तिमिस  से अवयव लाये हो 

शाब्बास ! कहूं तुम्हे क्यों न 

आत्म-रहित  जीव जो पाए हो 

__प्राक्षी  कुमारी 

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