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  • Prakshi al-Shaeirah

मनोबोल 

Updated: Sep 26


वर्षा , बारिश , छर जो कहिये , इस एक पर्व  के तो खूब नाम हैं।  इसकी  कोई धर्म,  विधि, रीती  नहीं।  एक यही तो वह  प्रकृति - कृत  त्यौहार है , जिसमें  मानवी देह  नहीं , अपितु  चर - अचर  सब  आत्मिक आनंद की अनुभूति करते हैं। बादलों की ताल पर मोर नाचता है , सौंधी  महकन  से  आत्मा  को  दावत मिलती है।  इसी  उत्सव के बाद  अन्तः करण  तृप्त हो कर , जीवन का पुनः दर्शन करता  है। 














देहाती भाषा की बात ही निराली है,  लिपि में  प्रायः  कम  ढलती है।  पर  अपने हर  रूप में  इसकी आंचलिकता मन  को आँखों  और कानों  से  ऊपर उठाकर   मोहित कर देती है।  सावन  के  लौकिक  दर्शन  पर  हृदय  से  एक  सुलभ  परन्तु  विलक्षण गान निकला।  इसके  राग में   मेरी दस्त की कलम भी  रत गई। और  अंजाम  आपके सामने हाज़िर  है।  धुन तो सही में सुरीली है!

मनोबोल 



ठन- ठन  करे 

घटा  घट-घट  छायो रे 

कहें  धोरो ,तोह कहें  कृष्ण 

इही  रंग बरसाए 

धूम- धड़कका  ई  दैवी 

कयो ं  इसे  हुली - दीबाली  में तलाशे हो 

खाली मेघा नहीं 

पावस भी घटा संग  भायो रे 

जीवन - कन  बरसे 

जीवन -रंग बरसे 

जो  इय  

ठन - ठन  करे 

घटा घट -घट  छायो  रे 

__प्राक्षी  कुमारी 

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