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  • Prakshi al-Shaeirah

जीवन की खोज

Updated: Sep 26


बुद्धि  तथा वाणी मानवता के लिए अद्भुत वरदान हैं।  परन्तु  उस वरदान का फलित होना या उसका अभिशाप बनना हमारे ऊपर निर्भर करता है। इसी प्रज्ञा व वाणी के मिल से जन्म होता है , उक्ति विधा का। ' उक्ति' अर्थात किसी के कथन ,वचन आदि।  जो कथन या उक्ति हममें सकरात्मक ऊर्जा का विकास करे उसे मैं 'सूक्ति' की परिभाषा कहना चाहूंगी। 

यूँ  तो सूक्ति लिखने का कोई  एक ढंग या नियम नहीं। परन्तु वाक्य - विन्यास  इसका एक महत्वपूर्ण  अवयव है। 

किसी सूक्ति  की भाषा तथा उसका आशय  उसकी विशेषता होती है।  शब्दों के इस हिरण्मय   तत्व के परिचय हेतु  मैं  आपके समक्ष  ' जीवन की खोज ' ( सुकथन ) प्रस्तुत करती हूँ। 



जीवन की सार्थकता ,  सफलता क्या है ? यह एक प्रश्न मुझे  एक अलग यात्रा पर ले गया। जिसका अनुभव आत्मीय है। अपने  इस अनोखे अनुभव को आप सभी के साथ बांटते  हुए , इस  सूक्ति अनुक्रम की पहली सूक्ति 'जीवन की खोज 'आपके सामने प्रस्तुत करती हूँ । 




जीवन की खोज 




कभी - कभी जीवन को खोजते हुए खुद ही भटक जाती थी। कभी भूतकाल में , कभी भविष्य में। 


भूतकाल में जीवन की खोज कुछ यूँ  प्रारम्भ हुई ,की अश्र ु  और मुस्कान का मिलन हुआ कुछ सुखी समय से वर्तमान जलने  लगा। कुछ दुखी समय से मन की अपूर्ण आकांक्षाएं। और इस भूत यात्रा में जीवन की उस खोज में असफल हो कर लौटी। 

भूत - यात्रा ने तो निराश कर  दिया। इसलिए भविष्य में चली गई। भूत की अपूर्ण आकाँक्षाओं की पूर्ति की तलाश में।  आशा के वाहन पर भविष्य की भी खूब यात्रा कर आई।  पर जीवन की तलाश अभी भी बाकि थी। 

पुनः निराश हो गई।  भूत , भविष्य में  तो  जीवन नहीं  मिला। फिर आत्म - साक्षात्कार हुआ।  आभास हुआ वर्तमान ही जीवन है।  



भूत की यात्रा से सिख ले सकते हैं।  भविष्य का स्वागत कर  सकते  हैं। परन्तु वर्तमान  में ही शायद जीवन जी सकते हैं। वास्तव में वही  जीवन की असली सार्थकता  होगी। इसकी अनुपस्थति में जीवन की सारी  सिद्धियाँ  अकारथ नज़र आने लगती हैं। 


 वास्तव  में  जब जीवन , जीवन रह पाएगा तभी सफल बन पाएगा ! 







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