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  • Prakshi al-Shaeirah

ज़िन्दगी : एक राह

Updated: Sep 26

जीवन में  बहुत से  कठिन समय आते हैं।  परन्तु जब सहन शक्ति परिसीमा पार कर जाती है , तब अक्सर हम हताशा , अविश्वास  , असंतोष  आदि जैसे अवगुणों  से ग्रस्त हो जाते है। यह कविता ,कवियत्री  के जीवन के  एक ऐसे  ही पाठ का वर्णन करती  है। 









ज़िन्दगी : एक राह 




  ज़िन्दगी की उस एक राह  पर यूँ  ही चलते जाना     

मोड़ आएंगे कई , 

पर मंज़िल की तरफ़ तू यूँ  ही  चलते जाना 


यह कोई मोड़ नहीं , जो  क्षण भर में खत्म हो जाए 

यह तो वो राह है, जो अंत तक साथ निभाए 



इसका यात्री खोजता है  क्षितिज  का वो दृश्य 

यूँ तो निकलता इस राह पर अकेला ही है वो 

परन्तु कुछ पल का ही सही,एक साथ उसे जाता है मिल



इस राह की लम्बी यात्रा में , 

कई सुख -दुःख की कलियाँ जाती हैं खिल 



इस राह पर , यह वो कभी न ख़त्म होने वाली यात्रा है 

बिना इस पर चले किसे उन चट्टानों को तोड़ना आता है 



दिन हो या रात , धूप हो या बरसात 

तू यूँ ही इस राह  पर बढ़ते जाना 

मोड़ आएंगे कई ,पर  मंज़िल की  तरफ़ तू  यूँ ही चलते जाना 





__प्राक्षी कुमारी 

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